नई दिल्ली:
ऐसे दौर में जब दुनिया में कम से कम दो मोर्चों पर आमने-सामने का युद्ध चल रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक तीसरे वैश्विक मोर्चे पर युद्ध तेज कर दिया. ये है ट्रंप का टैरिफ वॉर जो किसी भी अन्य युद्ध से ज़्यादा नुकसान दुनिया को पहुंचा रहा है. ट्रंप को लगता है कि दुनिया के तमाम देश अमेरिका की दरियादिली का फायदा उठाकर उसे आर्थिक नुकसान पहुंचाते रहे हैं. यही वजह है कि सत्ता में आने के साथ ही ट्रंप ने टैरिफ यानी सीमा शुल्क लगाकर हर देश को सबक सिखाना शुरू कर दिया. दुनिया का कोई इलाका इसके असर से नहीं बचा. ये अलग बात है कि चीन को लेकर ट्रंप सबसे ज़्यादा सख़्त हैं और बाकी देशों के साथ थोड़ी नरमी दिखाते हुए कुछ मोहलत दे रहे हैं. लेकिन ट्रंप के मिजाज का कोई ठिकाना नहीं और नाज़ुक मिजाज बाजार इसी वजह से गिरता, उठता, पड़ता जा रहा है. दुनिया भर के बाजारों में इस अस्थिरता का एक असर ये हुआ है कि सोना मजबूत हुआ है.
सोना ऐतिहासिक तौर पर अपने सबसे ऊंचे स्तर पर
भारत के कमोडिटी मार्केट में 24 कैरेट सोना प्रति दस ग्राम 97,500 रुपए के करीब पहुंच गया और एक लाख रुपए के मनोवैज्ञानिक स्तर से वो अब बस ढाई हज़ार रुपए ही पीछे है. सवाल ये है कि क्या मौजूदा टैरिफ वॉर के दौरान सोने के लिए मांग और तेज होगी जिसका असर उसकी बढ़ती क़ीमतों पर दिखेगा. क्या शेयर बाज़ार से निवेशकों का मोहभंग उन्हें सुरक्षित माने जाने वाले सोने की ओर और ज़्यादा मोड़ेगा. हालांकि, टैरिफ को लेकर ट्रंप के एलान से पहले ही निवेशकों को इसका अहसास था और सोने की मांग बढ़ गई थी. वो मांग बनी हुई है.. जानकार अब ये अटकल लगा रहे हैं कि सोना कब एक लाख रुपए को पार करेगा या फिर क्या उसकी कीमत गिर जाएगी. इसे लेकर जानकारों की अलग अलग राय है.
बैंक ऑफ अमेरिका के विश्लेषकों के मुताबिक कमोडिटी एक्सचेंज में सोने के दाम अगले दो साल में 3500 अमेरिकी डॉलर प्रति आउंस तक पहुंच सकते हैं. भारतीय मुद्रा में इसका मतलब है कि अगले दो साल में 24 कैरेट सोने का दाम 1 लाख 5 हजार रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच सकता है. गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों का अनुमान है कि मौजूदा साल 2025 के खत्म होते होते सोने के दाम 3300 अमेरिकी डॉलर प्रति आउंस यानी 99,400 रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता
दरअसल, ऐसे समय जब ट्रंप के टैरिफ युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बनी हुई है तो शेयर, बॉन्ड्स या करेंसी में निवेश को ज़्यादा जोखिम भरा माना जा रहा है और सोने में निवेश को ज़्यादा सुरक्षित. इसीलिए जोखिम वाली जगहों से निकाल कर पैसा सोने में लग रहा है. मांग बढ़ने के कारण सोने के दाम बढ़ रहे हैं. हालांकि, कुछ रिसर्च फर्म सोने को लेकर बहुत आशा भरी नहीं लग रहीं.

रिसर्च फर्म मॉर्निंग स्टार का तो मानना है कि अगले कुछ साल में सोना अपनी मौजूदा कीमत से 40% तक गिर सकता है. यानी सोना 55 से 56 हजार रुपए प्रति दस ग्राम तक गिर सकता है. अगर डॉलर के मुक़ाबले रुपया अपनी मौजूदा क़ीमत पर स्थिर रहा तो. मॉर्निंग स्टार के मुताबिक सोने की बढ़ती सप्लाई उसकी क़ीमतों के गिरने की वजह बनेगी क्योंकि दुनिया भर में देश खनन से सोना उत्पादन को तेज़ कर रहे हैं और इसके साथ ही सोने की रिसाइक्लिंग भी बढ़ गई है. मॉर्निंग स्टार का मानना है कि दुनिया भर के सेंट्रल बैंक सोने की लगातार ख़रीदारी को कम कर सकते हैं.
हालांकि, कई जानकार इस विश्लेषण से सहमत नहीं हैं. अब सवाल ये है कि सोने में आखिर ऐसा है क्या कि उसे लेकर आम आदमी से लेकर देश और सेंट्रल बैंक इतने उत्साहित रहते हैं और उसे अपने खजाने में भरने को लालायित रहते हैं. इसे आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं. हम जानते हैं कि किसी भी चीज की क़ीमत तभी होती है जब उसका ख़ास महत्व हो, वो ख़ास काम में आती हो. दुनिया में अकेला सोना ही ऐसी धातु है जो ऐसे कई मानकों पर खरा उतरता है. सदियों से सोने को संपत्ति, शक्ति और दैवीय गुणों का प्रतीक माना जाता है.
रंग जस का तस सुनहरा बना रहता
पहली बात ये है कि सोना बहुतायत में नहीं पाया जाता. जैसे लोहा, एल्युमिनियम या कोई और धातु. तो जो भी चीज़ कम मात्रा में हो और उसकी मांग ज़्यादा हो तो उसकी कीमत बढ़ेगी ही. सोने के साथ भी यही बात है. दुनिया में सोना बहुत अधिक मात्रा में नहीं पाया जाता. इस पीली-सुनहरी धातु की अद्भुत आभा इंसान को हमेशा अपनी ओर खींचती चली आई है. इसकी ये सुनहरी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती चाहे कितने भी समय इसे रख लिया जाए, क्योंकि सोने को आम तौर पर Inert metal माना जाता है यानी ऐसी धातु जो आम तौर पर रासायनिक क्रियाओं से खराब नहीं होती, उसमें जंग नहीं लगता इसीलिए उसका रंग जस का तस सुनहरा बना रहता है.

तीसरी बात ये है कि सोना एक ऐसी धातु है जो अपनी खूबियों के कारण गहनों में इस्तेमाल हो सकती है, क्योंकि ये malleable और ductile है. malleable का मतलब है इसे पीट पीट कर यानी दबाव से बहुत ही पतली शीट्स में बदला जा सकता है. ductile का मतलब है कि इसे खींच कर लंबे तारों में बदला जा सकता है. इन ही दोनों खूबियों के कारण खूबसूरत और बारीक गढ़त के गहनों को बनाने में सोने का इस्तेमाल किया जाता है. ऊपर से इसका सुनहरा रंग जो कभी खराब नहीं होता.
सोने को इन खूबियों की वजह से ही हमेशा से ताकत और वैभव का प्रतीक माना जाता रहा. ऐतिहासिक तौर पर वैश्विक व्यापार में अक्सर इसका इस्तेमाल सामान को खरीदने के लिए मुद्राओं की जगह किया जाता रहा. हर ताकतवर देश और शासक ने उसका भंडार बड़े से बड़ा बनाने की कोशिश की. ये माना गया कि किसी भी चीज की कीमत गिर जाए, सोना कभी इतना नहीं गिर सकता कि वो बेकार मान लिया जाए. यानी वो निवेश का सुरक्षित माध्यम है.

दुनिया के तमाम देशों, तमाम सभ्यताओं में सोने का धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक महत्व रहा. उसे दैवीय और राजकीय अधिकार का प्रतीक माना जाता रहा. सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक वजहों से दुनिया के कई देशों में सोने की बड़ी मांग होती है. चीन और भारत सोने की खपत में सबसे प्रमुख देश रहे हैं. भारत में तो सोने को लेकर अजब दीवानापन है. टैक्नोलॉजी का विकास होने के साथ ही सोने की अहमियत और बढ़ गई. विद्युत का अच्छा सुचालक यानी Good conductor of Electricity होने और जंग न लगने की वजह से इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकम्युनिकेशंस से जुड़े उपकरणों में उसका इस्तेमाल किया जाता है जैसे आपके हमारे हाथ में जो फोन है उसमें भी सोने का इस्तेमाल हुआ है.
इन ही सब खूबियों के कारण सोने का इस्तेमाल मेडिकल उपकरणों, नैनो टैक्नोलॉजी, अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े उपकरणों वगैरह में भी होता है. सोने की ये जो तमाम खूबियां हैं, वो एक साथ किसी और धातु में नहीं पाई जातीं. किसी में एक खूबी होगी तो दूसरी नहीं. इसीलिए दुनिया की अर्थव्यवस्था में सोने का इतना महत्व रहा है और आज भी उसकी जगह कोई और धातु नहीं ले पाई. इन ही खूबियों की वजह से जब भी शेयर बाजार हिचकोले खाता है. सोना उछलने लगता है. उसमें निवेश बढ़ने लगता है.
सोने के भंडार देश की आर्थिक ताकत का भी प्रतीक
Inflation यानी महंगाई के कारण दुनिया की मुद्राओं की कीमत कम हो सकती है लेकिन सोने में निवेश उससे बचने का एक विश्वसनीय तरीका माना जाता है. निवेशक अपने पोर्टफोलियो में विविधता के लिए सोने में निवेश करते हैं. ताकि वित्तीय बाज़ारों की तुनक मिज़ाजी से बचे रह सकें. आर्थिक या राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी सोने को निवेश का सबसे सुरक्षित रास्ता माना जाता है. दुनिया के तमाम देशों के सेंट्रल बैंक अपनी मुद्राओं में स्थिरता रखने के लिए सोने के भंडार रखते हैं. जब अक्सर मुद्राएं गिरती हैं तो सोने की क़ीमत बढ़ती है. सोने के भंडार देश की आर्थिक ताकत का भी प्रतीक माने जाते हैं. सोने को लिक्विड एसेट भी माना जाता है. यानी ऐसी संपत्ति जो बिना किसी नुकसान के जरूरत के समय पर तुरंत बेची जा सके. अपनी बेहतर क़ीमत के कारण सोने पर आसानी से कम ब्याज पर कर्ज मिल जाता है.
ये सोने पर यकीन ही है कि एक दौर में दुनिया के तमाम देशों की सरकारों ने मुद्रास्फीति से बचने और अंतरराष्ट्रीय वित्त और व्यापार में स्थिरता बनाए रखने के लिए अपनी मुद्राओं यानी करेंसी को सोने से जोड़ दिया. देशों ने मुद्रा की मानक इकाई को सोने की एक तय मात्रा के बराबर मान लिया. इसे गोल्ड स्टैंडर्ड कहा गया. इसके बाद देश उतनी ही मुद्रा छाप सकते थे, जितनी कीमत का सोना उनके पास था. मुद्रा को सोने से जोड़ने के कारण अथाह पेपर मनी छापने पर लगाम लग गई. इसका मतलब ये है कि अपनी मुद्राओं की कीमत बढ़ाने-घटाने की सरकारों की शक्ति भी सीमित हो गई. सोने में बदली जा सकने वाली मुद्रा अंतरराष्ट्रीय भुगतान का माध्यम बन गई. इससे देशों के बीच एक्सचेंज रेट में स्थिरता आई, महंगाई पर काबू और वित्तीय अनुशासन बना रहा. लोगों का अपनी मुद्रा में विश्वास बढ़ गया.

सबसे पहले 1821 में यूनाइटेड किंगडम ने गोल्ड स्टैंडर्ड शुरू किया. 1870 के दशक में जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका ने भी गोल्ड स्टैंडर्ड को अपना लिया. फिर तो दुनिया के कई देश इस ओर बढ़ गए. इसकी वजह ये थी कि तब पश्चिमी उत्तर अमेरिका में काफ़ी पैमाने पर सोने की खोज हुई थी और सोने की सप्लाई बढ़ गई थी. 1914 तक गोल्ड स्टैंडर्ड चलता रहा. तब तक सोने को एक खास कीमत पर पेपर मनी के बदले में खरीदा या बेचा जा सकता था.
पहला विश्व युद्ध शुरू होने के साथ ही गोल्ड स्टैंडर्ड के जाने के दिन भी आ गए. विश्व युद्ध के कारण देशों के बीच सोने के आयात-निर्यात पर तमाम पाबंदियां लग गईं. पहला विश्व युद्ध ख़त्म होने के कुछ साल बाद गोल्ड स्टैंडर्ड एक नई शक्ल में स्थापित हुआ. तब सोने की relative Scarcity यानी सापेक्ष कमी के कारण अधिकतर देशों ने गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड को अपनाया, जिसमें उनके केंद्रीय बैंकों के सोने के भंडारों को एक स्थिर एक्सचेंज रेट पर अमेरिकी डॉलर और ब्रिटिश पाउंड जैसी मजबूत मुद्राओं से बदला जा सकता था. 1930 के दशक में दुनिया पर जब महामंदी छाई यानी the great depression तो गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड फिर चरमरा गया. 1937 तक दुनिया के हर देश ने गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड छोड़ दिया. लेकिन तब तक बड़ी आर्थिक ताकत बन चुके अमेरिका ने दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा खरीद-बिक्री के लिए डॉलरों में सोने की एक नई न्यूनतम कीमत तय कर दी.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद अधितकर एक्सचेंज रेट या तो अमेरिकी डॉलर से जुड़े या सोने की कीमत से. लेकिन बाद के दशकों में अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली में सोने की आधिकारिक भूमिका वर्ल्ड एक्सचेंज में पूरी तरह खत्म हो गई और ये हैसियत मुख्य तौर पर डॉलर और अन्य मुद्राओं के हवाले हो गई. इसके बावजूद अपनी तमाम खास विशेषताओं के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था में सोने की अहमियत अब भी कम नहीं हुई है. दुनिया के देश अपने आर्थिक जोखिम को कम करने के लिए सोने के भंडार रखते हैं. विदेशी मुद्राओं के भंडार में विविधता लाने, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और मुद्रास्फीति से बचाव के लिए सोने के भंडार का इस्तेमाल होता है. खासतौर पर वित्तीय संकट के दौर में सोना एक बड़ी भूमिका निभाता है.
उदाहरण के लिए 1991 में जब भारत भारी आर्थिक संकट से गुज़र रहा था. जरूरी सामान जैसे कच्चे तेल और खाद के आयात के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं थी, अंतरराष्ट्रीय भुगतान का भारी संकट था, पुराना कर्ज़ चुकाना भारी पड़ रहा था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार उससे निपटने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी. इसके लिए देश का सोना ब्रिटेन में गिरवी रखने का फ़ैसला किया गया. लेकिन तभी चंद्रशेखर सरकार गिर गई और नए लोकसभा चुनाव होने लगे. लेकिन देश के सामने विदेशी मुद्रा भंडार एक हजार करोड़ भी नहीं रह गया था. ऐसे में चुनावों के बीच ही आपात उपाय के तौर पर तत्कालीन मंत्री यशवंत सिन्हा को देश का सोना विदेशी बैंक में गिरवी रखने की फाइल पर दस्तख़त करने पड़े ताकि उससे मिलने वाली विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल ज़रूरी भुगतान में कर सके. चुनाव ख़त्म होने के बाद ये सोना एयरलिफ्ट किया गया जिसे स्विस बैंक UBS ने ख़रीदा था और बदले में भारत को 20 करोड़ डॉलर मिले थे.
जून 1991 में नरसिम्हा सरकार सत्ता में आई तो देश के पास बस तीन हफ़्ते के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा बची थी. भुगतान संकट को देखते हुए जुलाई महीने में फिर रिजर्व बैंक को बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान में 40 करोड़ डॉलर के एवज में सोना गिरवी रखना पड़ा. दोनों बार कुल मिलाकर 87 टन सोना गिरवी रखना पड़ा. इसके बाद बड़े पैमाने पर हुए आर्थिक सुधारों से देश की आर्थिक दशा सुधरनी शुरू हुई और फिर उसी साल दिसंबर तक भारत ने अपना कुछ सोना वापस खरीद लिया.
किसके पास कितना सोना
जब आर्थिक हैसियत सुधरती गई तो अपने विदेशी मुद्रा भंडार को डाइवर्सिफाई करने के लिए भारत की सरकारें सोना ख़रीदती रहीं. 2009 में मनमोहन सरकार के दौर में भारत ने 200 टन सोना ख़रीदा. अप्रैल 2022 से सितंबर 2024 तक भारत ने 100 टन सोना और ख़रीदकर अपने गोल्ड रिजर्व को बेहतर किया.
सोना जब इतना अहम है तो ये जानने की इच्छा स्वाभाविक है कि किस देश के पास कितना सोना है. तो अब एक नजर इस पर भी डाल लेते हैं कि दुनिया में सोने का सबसे ज़्यादा भंडार रखने वाले दस देश कौन से हैं. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल और आईएमएफ़ के मुताबिक दिसंबर 2024 तक सबसे ज़्यादा 8133 टन सोना अमेरिका के पास था. इसके बाद दूसरे स्थान पर 3,351 टन के साथ जर्मनी के पास सोना है. फिर इटली, फ्रांस, रूस के बाद चीन का स्थान छठा है. चीन के पास 2279 टन सोना है. चीन के बाद स्विट्ज़रलैंड और फिर भारत का स्थान आठवां है. भारत के पास करीब 876 टन सोने का भंडार है. इसके बाद जापान और तुर्की का स्थान आता है.
अब बात ये आती है कि सोने के प्रति इंसान का मोह कितना पुराना है. तो इसकी बात करें तो ये इतिहास से भी पुराना है यानी प्रागैतिहासिक यानी prehistoric… शायद उस दौर में भी सोने की चमक इंसान को अप नी ओर खींचती रही होगी, जबकि लिखित रिकॉर्ड हमें नहीं मिलते. पुरा पाषाण काल में करीब 40 हज़ार साल ईसवी पूर्व की कुछ गुफाओं में सोने के कुछ अंश मात्र मिले हैं. मानव द्वारा सोने के इस्तेमाल के पहले ठोस सबूत क़रीब 3000 साल ईसा पूर्व मिस्र के मिलते हैं. प्राचीन मिस्र के राजा यानी फ़राओ सोने की अहमियत समझते थे. सोने को देवताओं के शरीर का हिस्सा माना जाता था.मिस्र के लोगों ने ही सबसे पहले करेंसी एक्सचेंज रेशो तय की जिसमें एक यूनिट गोल्ड को ढाई यूनिट चांदी के बराबर माना गया. कीमती और शुद्ध माने जाने के कारण ही मिस्र में सोने का इस्तेमाल ममीज से लेकर पिरामिड के अंदर तक किया गया.
सोने के साथ भारतीयों का लगाव भी प्राचीन काल से ही है. 1500 से 1200 ईसवी पूर्व में रचे गए ऋग्वेद में तो कहा गया है कि हिरण्यगर्भ यानी सोने का गर्भ या फिर सोेने का बीज ब्रह्मांड की उत्पत्ति का स्रोत है. भारत में सोने को हमेशा से पवित्र धातु माना गया. सोने का इस्तेमाल देवी-देवताओं की शोभा बनने से लेकर गहनों और दवाओं तक में होता रहा है. ऐतिहासिक दौर से ही भारत का वो चाहे कोई राज्य रहा हो सोना उसकी आर्थिकी का खास हिस्सा रहा. प्राचीन यूनान यानी ग्रीस में भी सोने का महत्व समझा गया. सोने को मुद्रा की तरह अपनाया गया. देवी-देवताओं को स्वर्ण भंडारों के साथ दिखाया गया. सोना हैसियत का प्रतीक बना रहा. प्राचीन तुर्की का लिडिया साम्राज्य पहली सभ्यता रहा जिसने सोने को मुद्रा की तरह इस्तेमाल किया. कुल मिलाकर ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि दुनिया की तमाम सभ्यताओं ने कीमत और इस्तेमाल में सोने का लोहा माना.
हालांकि, एक बहस ये भी कहती है कि दुनिया में सोने से ज़्यादा झगड़ा किसी धातु के लिए नहीं हुआ. सोने के लिए इंसानों को क़त्ल किया गया, राज्यों पर आक्रमण हुए, भाई ने भाई को सोने के आगे कुछ नहीं समझा, ताक़त और वैभव को सोने में आंका गया, इंसानियत की क़ीमत नहीं समझी गई. यही बहस कहती है कि सोने से अच्छा तो वो लोहा है जिसने इंसान को खेती करने में मदद की, हल के फाल बनाए, खाने-पीने के बर्तन बनाए, जानवरों से बचाव के हथियार बनाए. लेकिन इसी लोहे से सोने को हथियाने के हथियार भी बने. सोने और लोहे की महत्ता को लेकर ये बहस अनंत है.

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