नई दिल्ली :
जम्मू कश्मीर के पहलगाम में मंगलवार को आतंकियों ने 26 सैलानियों की हत्या कर दी. मंगलवार दोपहर करीब ढाई बजे कुछ आतंकवादियों ने उन बेगुनाह पर्यटकों को निशाना बनाया, जो कश्मीर घूमने के लिए आए थे. पहलगाम से सटी एक जगह है बैसरन, जिसे स्विट्जरलैंड ऑफ इंडिया कहा जाता है और आतंकियों ने वहीं कहर ढाया. आतंकियों ने चुन-चुनकर पर्यटकों को निशाना बनाया, जिन लोगों ने आतंकी हमले का मंजर देखा उन्होंने बताया कि आतंकवादियों ने नाम पूछकर गोलियां चलाई. कुछ मिनटों में आतंकियों ने किसी का सुहाग छीन लिया तो किसी के घर का चिराग उजाड़ दिया. आतंकियों ने पत्नी की आंखों के सामने पति को गोली मार दी तो बच्चों के सामने पापा को मौत की नींद सुला दिया. NDTV के शो ‘रूल ऑफ लॉ’ में जानी मानी वकील सना रईस खान लोगों को कानून की बारीरियों के बारे में बताती हैं. आज इस शो में बात इसी आतंकी हमले की और आतंक विरोधी कानूनों की.
पहलगाम आतंकी हमले के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब के दौरे पर थे. उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह से बात की और थोड़ी ही देर में अमित शाह श्रीनगर के लिए रवाना हो गए. श्रीनगर पहुंचकर उन्होंने जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों के साथ मीटिंग की. इस बीच प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी दौरे को बीच में ही खत्म कर दिया और वापस लौट आए. बुधवार की सुबह पीएम मोदी दिल्ली पहुंचे और एयरपोर्ट पर ही उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठक की.
इधर पीएम मोदी दिल्ली पहुंच चुके थे और उधर गृह मंत्री अमित शाह श्रीनगर में मौजूद थे. बुधवार की सुबह अमित शाह पहलगाम गए और उस जगह को देखा जहां अटैक हुआ था. उन्होंने हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी. अमित शाह घायलों का हालचाल जानने अस्पताल भी गए और टेरर अटैक के पीड़ितों से भी बात की.
पहलगाम हमले के बाद पीएम मोदी ने एक्स पर जो पहला पोस्ट किया उसमें लिखा कि उनके नापाक इरादे कभी पूरे नहीं होंगे और उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा. अमित शाह ने भी यही कहा कि जिसने भी साजिश को अंजाम दिया उसे बख्शा नहीं जाएगा. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक कार्यक्रम में बयान कि बहुत जल्द करारा जवाब दिया जाएगा. बुधवार की शाम को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने CCS यानी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक की और पाकिस्तान के खिलाफ पांच फैसले किए गए, जिसमें से एक सिंधु जल समझौते को स्थगित करना भी हैं.

गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कार्यक्रम में बिहार गए थे. उन्होंने वहां पहलगाम में मारे गए लोगों को याद किया और बिना नाम लिए पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि पहलगाम के दोषियों को मिट्टी में मिलाने का समय आ गया है.
बिहार की धरती से पीएम मोदी ने टेरररिज्म की लड़ाई को लेकर दुनिया को भी संदेश दिया. प्रधानमंत्री का बयान ये इशारा कर रहा था कि हमले की जड़ में कहीं न कहीं पाकिस्तान है. इसी दिन यानी गुरुवार को सरकार ने बड़ा फैसला किया. भारत में मौजूद पाकिस्तानियों का वीजा सस्पेंड कर दिया गया और उन्हें पाकिस्तान लौटने का आदेश दे दिया गया. सरकार के लगातार एक्शन ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी. सरहद पार भी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने बैठक ली और भारत के खिलाफ कुछ निर्णय लिए गए.

पहलगाम हमले के पीछे पाकिस्तान का क्या रोल?
आतंकी हमले के बाद जब सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हुई तो पता चला कि हमले की साजिश दो आतंकी संगठनों ने मिलकर रची थी. एक लश्कर ए तैयबा, द रेजिस्टेंस फ्रंट और दूसरा जैश-ए-मुहम्मद. इस हमले को सामने से लश्कर के मुखौटा संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट यानी टीआरएफ ने अंजाम दिया. फिर इस साजिश को पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के इशारे पर छोटे छोटे हिट स्क्वाड के इस्तेमाल से अंजाम दिया गया. इस आतंकी मॉड्यूल में टारगेट किलिंग करने के साथ ही आतंकियों को जंगली और ऊंचे इलाकों में छिपने के लिए ट्रेंड किया जाता है. यह स्क्वाड मारो और भागो की प्लानिंग और ओवर ग्राउंड वर्कर्स के साथ काम करता है.
पहलगाम में आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए साजिश का जो ब्लूप्रिंट पाकिस्तान में तैयार किया गया था, उसके और भी ज्यादा सबूत तब मिले जब सुरक्षा एजेंसियों की जांच आगे बढ़ी.
- NIA की टीम को शुरुआती जांच में इस्तेमाल किए गए 50 से 70 कारतूस मिले.
- ये कारतूस अमेरिका में बने M4 कार्बाइन असॉल्ट राइफल और AK-47 से चलाए गए थे.
- एम 4 कार्बाइन के बारे में बताया जाता है कि ये अफगानिस्तान में इस्तेमाल हुए अमेरिकी हथियार हैं.
- जब 2021 में अमेरिकी सेना लौट गई तो ये हथियार तालिबान के हाथों में आ गए.
- इन हथियारों को अफगानिस्तान से पाकिस्तान के आतंकी गुटों ने खरीद लिया था.
- इसके बारे में माना जाता है कि आतंकी गुटों ने M 4 कार्बाइन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आएसआई की शह पर खरीदे थे.
- इनके अलावा एके 47 की जो गोलियां वहां मिली हैं, वो चीन में बनी हुई हैं. उनकी खासियत ये होती है कि वो बुलेट प्रूफ जैकेट को भी चीर देती है.
- वो बुलेट चीन से ही पाकिस्तान को मिली और पाकिस्तानी सेना से आतंकवादियों को.
जांच जैसे जैसे आगे बढ़ रही है, ये साफ होता जा रहा है कि पहलगाम में जो आतंकी हमला हुआ उसके पीछे किसी न किसी तरह से पाकिस्तान का हाथ है.
आतंक के खिलाफ देश में हैं ये कानून
पाकिस्तान के खिलाफ हमारी सरकार का जो एक्शन है वो तो है और आगे भी होंगे, लेकिन आज हम उन कानूनों की बात भी करेंगे जो आतंक को रोकने और आतंकवादियों को उनके किए की सजा देने के लिए हमारे देश में मौजूद है.
गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (Unlawful Activities Prevention Act)
यह एक्ट आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए है. इस एक्ट के तहत पुलिस ऐसे आतंकियों, अपराधियों या दूसरे लोगों को आइडेंटिफाई करती है, जो आतंकी गतिविधियों में शामिल होते हैं, या फिर आतंकी गतिविधियों के लिए लोगों को तैयार करते हैं या फिर ऐसी गतिवधियों को बढ़ावा देते हैं.
UAPA 1967 में लाया गया था. इस कानून को संविधान के आर्टिकल 19(1) के तहत दी गई बुनियादी आजादी पर लॉजिकल लिमिटेशंस लगाने के लिए लाया गया था. पिछले कुछ सालों में आतंकी गतिविधियों से जुड़े POTA और TADA जैसे कानून खत्म कर दिए गए, लेकिन UAPA कानून अब भी मौजूद है और पहले से ज्यादा मजबूत है.
अगस्त 2019 में UAPA का संशोधन बिल संसद में पास हुआ, जिसके बाद इस कानून को ज्यादा ताकत मिल गई. 2019 के बाद इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को जांच के आधार पर आतंकवादी घोषित किया जा सकता है. पहले यह ताकत केवल किसी ऑर्गेनाइजेशन को लेकर थी यानी इस एक्ट के तहत किसी संगठन को आतंकवादी संगठन घोषित किया जाता था. हालांकि अब किसी व्यक्ति का किसी आतंकी संगठन से संबंध दिखाना भी जरूरी नहीं होगा.
आतंकवादी का टैग हटवाने के लिए उसे कोर्ट की बजाय सरकार की बनाई गई रिव्यू कमेटी के पास जाना होगा. हालांकि बाद में कोर्ट में अपील की जा सकती है.

कितना ताकतवर है UAPA कानून
अब आपको बताते हैं कि UAPA कानून कितना ताकतवर है और इसका दायरा कितना बड़ा है. इस कानून का इस्तेमाल आतंकियों और अपराधियों के अलावा एक्टिविस्ट पर भी हो सकता है.
- UAPA के सेक्शन 2(o) के तहत भारत की अखंडता पर सवाल करने को भी अवैध गतिविधियों में शामिल किया गया है.
- UAPA में धारा 18, 19, 20, 38 और 39 के तहत केस दर्ज होता है.
- धारा 38 तब लगती है जब आरोपी के आतंकी संगठन से जुड़े होने की बात पता चलती है.
- धारा 39 आतंकी संगठनों को मदद पहुंचाने पर लगाई जाती है.
- इस एक्ट के सेक्शन 43D (2) में किसी शख्स की पुलिस कस्टडी का टाइम दोगुना किया जा सकता है.
- अगर किसी पर UAPA के तहत केस दर्ज हुआ है, तो उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती. यहां तक कि अगर पुलिस ने उसे छोड़ दिया हो तब भी उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती.
- कानून के सेक्शन 43D (5) के मुताबिक, कोर्ट आरोपी को जमानत नहीं दे सकता, अगर उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया केस बनता है.
- अवैध संगठन और आतंकी गिरोह की सदस्यता को लेकर इसमें कड़ी सजा के प्रावधान हैं.
- अगर कोई आरोपी उस संगठन का सदस्य है जिसे सरकार ने आतंकी संगठन बताया है तो उसे उम्र कैद की सजा मिल सकती है, लेकिन कानून में ‘मेंबरशिप’ की कोई साफ परिभाषा नहीं है.
UAPA के साथ ही एनएसए यानी नेशनल सिक्योरिटी एक्ट भी है. इसे 1980 में बनाया गया था. यह कानून केंद्र या राज्य सरकारों को किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की शक्ति देता है यदि वो देश की सुरक्षा, विदेशी संबंधों या पब्लिक ऑर्डर के लिए खतरा है.

इन कानूनों को कर दिया गया खत्म
इसके साथ ही कई ऐसे एक्ट हैं, जो एक वक्त काफी चर्चा में रहे लेकिन समय के साथ उन एक्ट को खत्म कर दिया गया.
आतंकवाद निरोधक अधिनियम (Prevention of Terrorism Act) यानी POTA 2002 में बनाया गया था. यह संदिग्धों को बिना केस चलाए हिरासत में रखने की ताकत देता था. इस एक्ट को 2004 में खत्म कर दिया गया.
Terrorist and Disruptive Activities Prevention Act (आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) यानी TADA भारत का पहला एंटी टेररिज्म कानून था जिसे सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए लागू किया था. यह कानून 1985 से 1995 तक लागू था.
NIA कैसे करती है काम और क्या है अधिकार?
आतंकवादी घटनाओं को रोकने, आतंकी घटनाओं की जांच और आतंकवादियों से निपटने के लिए एक खास एजेंसी बनाई गई है, जिसे नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी यानी NIA कहते हैं. इस एजेंसी का गठन NIA ACT, 2008 के तहत किया गया था. इस एजेंसी को 2008 में मुंबई हुए आतंकवादी हमलों के बाद केंद्रीय एजेंसी के तौर पर स्थापित किया गया था. पहलगाम हमले की जांच भी NIA कर रही है.
अब आपको NIA एक्ट के बारे में बताते हैं. यह एक्ट अमेरिका की एफबीआई (FBI) की तर्ज पर NIA को फेडरल एजेंसी बनाता है. NIA एक्ट ने एजेंसी को आतंकवाद से जुड़ें मामलों में भारत के किसी भी इलाके में स्वत: संज्ञान से मामला दर्ज करने का अधिकार दिया है.
साथ ही ये एक्ट NIA को ये अधिकार देता है कि राज्य सरकार की अनुमति के बिना राज्य में एंट्री और संदिग्ध की जांच की जा सकती है. 2019 में इस एक्ट में कई बदलाव किए गए और जांच किए जाने वाले मामलों के दायरे को बढ़ाया गया. NIA अब मानव तस्करी, जाली मुद्रा, अवैध हथियार, साइबर आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच भी कर सकती है. इस संशोधन ने केंद्र सरकार को एनआईए ट्रायल के लिए सेशन कोर्ट को स्पेशल कोर्ट नॉमिनेट करने की ताकत दी.
कोई भी NIA ऑफिसर राज्य के डीजीपी से पहले परमिशन लिए बिना छापा मार सकता है और आतंकवाद से जुड़ी संपत्ति जब्त कर सकता है. जांच अधिकारी को सिर्फ NIA के डीजी से परमिशन की जरूरत होती है.
आतंकी हमले का पीड़ित के क्या हैं अधिकार?
अगर आप या आपका कोई रिश्तेदार या आपके जान पहचान का कोई शख्स आतंकी हमले का पीड़ित हो तो आपका कानूनी अधिकार क्या है. आइए जानते हैं.
मुआवजे का अधिकार
आतंकी हमले में घायल या मारे गए लोगों को नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजे का अधिकार होता है. यह मुआवजा आर्थिक नुकसान के लिए जैसे कि इलाज का खर्च और जो इनकम आपकी रुक गई है उसके लिए हो सकती है. आमतौर पर सरकार हमले के पीड़ितों का इलाज कराती है और मुआवजा भी देती है. मृतकों के परिवार वालों को भी मुआवजा मिलता है, अगर ना मिले तो आप पूरे अधिकार के साथ सरकार से वो मांग सकते हैं.
सहायता प्राप्त करने का अधिकार
आतंकवाद से प्रभावित लोगों को तुरंत और लंबे समय तक सहायता का अधिकार होता है. इसमें मेडिकल असिस्टेंस, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास शामिल हैं.
अगर कोई आतंकी हमले का पीड़ित है तो उसके पास राइट टू जस्टिस भी होता है. वो इस बात की कानूनी लड़ाई लड सकते हैं कि आतंकवादियों को पकड़ा जाए और मुकदमा चलाया जाए. यह अधिकार आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय देने में अहम भूमिका निभाता है.
टेररिज्म भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. 2001 में अमेरिका में आतंकवादियों ने न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला किया था. इस हमले को अल कायदा ने अंजाम दिया था. इसमें 3000 से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई थी. इस हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र ने एक ऐतिहासिक कदम लिया. संयुक्त राष्ट्र परिषद में प्रस्ताव 1372 पारित किया, जिसके जरिए एंटी टेरर कमेटी का गठन किया गया. अब समय-समय पर उस कमेटी की बैठक होती है.
बिना लाइसेंस की गन मिले तो UAPA लगेगा?
एक शख्स ने सवाल पूछा है कि अगर किसी के पास बिना लाइसेंस की कोई गन मिलती है तो क्या उसपर UAPA लग सकता है और हां तो क्या सजा हो सकती है?

सिर्फ एक बिना लाइसेंस की बंदूक रखना अपने आप में UAPA के तहत मामला नहीं बनाता. आमतौर पर इसे आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत देखा जाता है, जो अवैध हथियार रखने पर सजा देता है. हालांकि, कुछ स्थितियों में UAPA भी लागू हो सकता है, अगर ये शर्तें पूरी हों:
- अगर बिना लाइसेंस की बंदूक का किसी आतंकी गतिविधि से संबंध हो, या उस व्यक्ति पर आतंकी हमले की तैयारी या उसमें सहयोग करने का शक हो.
- अगर वह व्यक्ति किसी आतंकी संगठन का सदस्य हो या उसकी मदद कर रहा हो, और बंदूक का इस्तेमाल आतंक फैलाने के लिए किया जाना हो. उदाहरण के लिए अगर किसी के पास अवैध हथियार मिले और यह साबित हो जाए कि वह हथियार किसी आतंकी हमले में इस्तेमाल होने वाला था, तो UAPA की धारा 18 (साजिश), 23 (अवैध हथियार), या 20 (आतंकी गिरोह का सदस्य) के तहत केस दर्ज हो सकता है.
UAPA के तहत सजा:
- सेक्शन18 (आतंकी कृत्य की साजिश) – उम्रकैद तक की सजा.
- सेक्शन 20 (आतंकी गिरोह का सदस्य होना) – उम्रकैद तक की सजा.
- सेक्शन 23 (आतंकवाद के लिए हथियार रखना) – कम से कम 5 साल की सजा, जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है और साथ में जुर्माना भी हो सकता है.
इसलिए नीयत (intent) बहुत ज़रूरी है. अगर मामला सिर्फ अवैध हथियार रखने का है, तो यह आर्म्स एक्ट के तहत आएगा, लेकिन अगर उसमें किसी भी तरह का आतंकी एंगल जुड़ता है, तो UAPA लागू हो जाएगा और फिर सजा बहुत सख्त हो जाती है.

आतंकी होने का शक हो तो क्या करें?
एक अन्य शख्स ने पूछा है कि अगर किसी पर आतंकवादी होने का शक हो तो क्या करना चाहिए?
अगर कोई व्यक्ति सिर्फ आतंकवादी होने के शक के दायरे में आता है, तो कुछ जरूरी और संवैधानिक कदम उठाए जाने चाहिए:
- तुरंत पुलिस या संबंधित एजेंसी को सूचित करें: सबसे पहला कदम है कि आप शक के बारे में स्थानीय पुलिस, ATS (Anti-Terrorism Squad) या NIA (National Investigation Agency) को जानकारी दें. ये एजेंसियां जांच करने की जिम्मेदार होती हैं.
- सबूत या संदेह का आधार साझा करें: अगर आपके पास कोई वीडियो, बातचीत, सोशल मीडिया एक्टिविटी या अन्य जानकारी है, तो वह एजेंसियों को सौंपें. गुमनाम रूप से भी सूचना दी जा सकती है.
- कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए: सिर्फ शक के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती. कानूनन, किसी के खिलाफ कार्रवाई तभी हो सकती है जब उसके खिलाफ प्रथम दृष्ट्या सबूत हों. पुलिस को जांच कर प्रमाण जुटाने होते हैं.
- शक के आधार पर गिरफ्तारी नहीं, जांच जरूरी: यदि पुलिस को शक है, तो वह व्यक्ति को पूछताछ के लिए बुला सकती है, लेकिन गिरफ्तारी तभी होगी जब पर्याप्त सबूत मिल जाएं.
- व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान जरूरी: किसी भी भारतीय नागरिक को, चाहे उस पर शक क्यों न हो, संविधान के तहत कानूनी सुरक्षा और अपनी बात रखने का अधिकार है.
- शक होने पर खुद कार्रवाई न करें: यह देश की सुरक्षा और कानून दोनों का मामला है. सही तरीका यही है कि जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को सौंप दी जाए, ताकि वे जांच करें और यदि ज़रूरी हो तो UAPA जैसे कानूनों के तहत कार्रवाई हो.
आपको कोई बार बार टेरररिस्ट बुलाए तो?
एक अन्य शख्स ने सवाल किया है कि अगर आपको कोई बार बार टेरररिस्ट बुलाए तो आप क्या कर सकते हैं?
अगर कोई आपको बार बार आतंकी कहकर बुलाता है वो भी बिना किसी सबूत के तो ये आपकी प्रतिष्ठा और मानसिक शांति दोनों को आहत करता है और इसके खिलाफ आप लीगल एक्शन ले सकते हैं. आप ये स्टेप फॉलो कर सकते हैं.
- आप Defamation (मानहानि) का केस दर्ज करें: आप क्रिमिनस defamation का केस कर सकते हैं. अगर किसी ने आपको टेररिस्ट कहा और उसका कोई आधार नहीं है तो ये आपकी इमेज को खराब करने की कोशिश मानी जाएगी.
- उत्पीड़न और मानसिक क्रूरता के लिए शिकायत: अगर बार बार ऐसा किया जा रहा है तो आप उत्पीड़न या शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना के तहत भी FIR दर्ज करा सकते हैं.
- SC/ST एक्ट या अल्पसंख्यक संरक्षण कानून (अगर लागू होते हैं): अगर आप किसी अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं तो हैं और ये कमेंट उस आधार पर दिया गया है तो प्रासंगिक सुरक्षात्मक कानून भी लागू हो सकते हैं.
- साइबर अपराध शिकायत (अगर ऑनलाइन कहा गया हो): अगर किसी ने आपको सोशल मीडिया पर आतंकवादी कहा है तो आप साइबर सेल में शिकायत कर सकते हैं। आईटी एक्ट के तहत सख्त प्रावधान हैं.
- सिविल कोर्ट में निषेधाज्ञा का मुकदमा: आप सिविल कोर्ट में भी एक निषेधाज्ञा ले सकते हैं, जिसमें उस व्यक्ति को कानूनी रूप से रोका जा सकता है, कानूनी रूप से आपको और बदनाम करने से रोका जा सकता है.
आप सबको यह याद रखना होगा कि हर बार आतंकी कहना ना सिर्फ गलत है बल्कि यह किसी के गरिमापूर्ण जीवन जीने के हक पर हमला भी है, जो कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत संरक्षित है.

कसाब को भी मिला था बचाव का अधिकार
26 नवंबर 2008 की तारीख हमारा देश कभी भूल नहीं सकता. मुंबई में हमला हुआ था. पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने जोरदार कोहराम मचाया था. 166 से ज्यादा लोग मारे गए थे. हमारी एजेंसियों ने 10 में से 9 आतंकियों को मार गिराया था, लेकिन अजमल कसाब पकड़ा गया था. हमारे संविधान में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है. अपने बचाव का अधिकार है. भले ही कसाब आतंकवादी था, लेकिन हमारे संविधान के मुताबिक कसाब को भी कानूनी लड़ाई लड़ने का अधिकार मिला. एनआईए कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में कसाब को अपनी बात रखने के लिए वकील मिले.
NIA कोर्ट ने कसाब को मौत की सजा सुनाई थी. उस फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में कसाब ने याचिका दाखिल की थी और वहां भी उसे अपनी दलील रखने के लिए सरकार की ओर से वकील मिले और जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तब कसाब की दलील रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन को अपॉइंट किया. सुप्रीम कोर्ट ने कसाब की मौत की सजा बरकरार रखी और फिर 2012 में कसाब को पुणे के येरवदा जेल में फांसी पर लटका दिया गया.
बचाव के लिए दिए गए थे वो वकील
बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देशों पर कसाब का बचाव करने के लिए भी दो वकील नियुक्त किए गए थे. वो थे अमीन सोलकर और फरहाना शाह. सोलकर और शाह ने मुंबई हाई कोर्ट में मौत की सजा के खिलाफ लगभग नौ महीनों तक कसाब के लिए दिन प्रतिदिन के आधार पर बहस की थी.
दोनों वकीलों के अप्वाइंटमेंट के बाद जो नोटिफिकेश जारी किया गया था, उसमें कहा गया था कि सोलकर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर होंगे और फरहाना शाह असिस्टेंट प्रॉसिक्यूटर होंगी और उसी के हिसाब से दोनों को फीस मिलेगी, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दोनों वकीलों को कसाब की सजा के 10 साल बाद भी फीस नहीं मिल पाई. दूसरी ओर महाराष्ट्र के जस्टिस डिपार्टमेंट ने ये दलील दी कि दोनों वकीलों ने बिल जमा नहीं करवाए थे. जब तक बिल जमा नहीं होंगे, भुगतान नहीं होगा.

कसाब को फांसी तक पहुंचाने में था दीपिका का योगदान
कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाने और उसे खिलाफ कानूनी लड़ाई को पुख्ता करने में एक छोटी लड़की का बहुत बड़ा रोल था.
वो लडकी सिर्फ नौ साल की थी और उसका नाम देविका रोतावन था. आंतकी हमले में कसाब ने उसके पैरों में गोली मार दी थी. स्टेशन पर इस हमले में 50 लोगों की मौत हो गई थी और 100 लोग घायल हो गए थे. कसाब के आईडेंटिफिकेशन के लिए वो बैसाखी पर कोर्ट पहुंची थी. अब देविका 25 साल की हो चुकी हैं. हाल ही में तहव्वुर राणा को भारत में प्रत्यर्पित किया गया तो देविका ने कई अनुभव बताए. उन्होंने बताया कि कसाब ने तब एक नजर में मुझे देखा और फिर नजरें नीचे झुका ली. इंसाफ मिला लेकिन, मेरी जिंदगी इतनी आसान नहीं थी. स्कूल ने डर के मारे मुझे एडमिशन नहीं दिया और कहा कि मेरे रहने से और बच्चों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है. किसी तरह पढ़ाई पूरी हुई.

(Grievance Redressal – IT Rules 2021)
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